About Kaulantak Peeth in Hindi

कौलान्तक पीठ का प्राचीन नाम कुलान्त पीठ है.जिसका अर्थ होता है कुलो का अंत .कुल अर्थात धार्मिक संप्रदाय .कुलान्त पीठ अर्थात जहाँ सभी धार्मिक सम्प्रदायों की विद्या का अंत हो जाता है.क्योंकि कुलान्त पीठ या कौलान्तक पीठ हिमालय के ही पर्यायवाची नाम है.इस लिए भी कुलान्त यानि के जहा से धर्म की परम पीठ है.इतिहासकारों के अनुसार विपाशा नाम की नदी जिसे वर्तमान में व्यास नदी कहा जाता है.का पूर्वी उत्तरी कुछ पश्चमी भाग कौलान्तक पीठ कहलाता है.सिद्ध संप्रदाय के अनुसार पाकिस्तान की तोरा बोरा से ले कर मयम्मार वर्मा तक की कुल्लू से ले कर वर्तमान तिब्बत तक जहाँ मानसरोवर है की पठार सहित भूमि ही कौलान्तक पीठ है.तंत्र मंत्र की वाममार्गी विद्या जादू टोने के कारण चीनाचार से पूर्व इसे कौलाचारियों की भूमि भी कहा गया.आदि गुरु हिरान्यगर्भ द्वारा सर्व प्रथम इसी कुल को योग का ज्ञान दिया गया था.इस लिए इसे कोलांतर पीठ भी कहते है.कोल अर्थात चक्र .शट चक्रों के रहस्यों को जानने वाला कुल .कोलांतर.फिर इसे ही क्रमश: कुलांतर पीठ का नाम भी दिया गया.जिसका अर्थ भी है कुलो का अंतर.अर्थात.शक्ति के तीन कुल है.१) काली कुल २) मृ कुल ३) श्री कुल .जिसमे से मृ कुल को गुप्त रख्खा जाता है.इन तीन कुलो का पूरण ज्ञान इसी पीठ के पास होने के कारण इसे कुलांतर पीठ भी कहा गया.फिर 84 सिद्धों ने आ कर इस पीठ से गलत परम्पराओं को हटाया जिसे कौलाचार कहा जाता था.फिर कौलाचार का अंत यहीं आ कर हुआ.इसी लिए ये पीठ कौलातक के रूप में सामने आई .कुलांतर पीठ नाम देने का सबसे बड़ा कारण यह भी था की उस समय सारा देश ये मानता था की स्त्री को गायत्री .महाविद्या.योग.तंत्र.और साधनों को संपन्न करे की आज्ञा नहीं.साथ ही शादी शुदा स्त्री बिना पति की आज्ञा के साधना नहीं कर सकती .उनको अधिकार नहीं.लेकिन कुला.तत्कालीन तंत्र भाषा में स्त्री को कहा जाता था.अंतर यानि भेद.बाकियों की तरह नहीं.स्त्री को साधना का कोई भी मार्ग चुनने देने की स्वतंत्रता के कारण.भी कुलांतर नाम पड़ा.आज भी भारत में धर्म संप्रदाय बिना पति आज्ञा के स्त्रियों को दीक्षा नहीं देते .जबकि पुरुष बिना पत्नी आज्ञा के ले सकता है.इस प्रकार कौलान्तक पीठ की परिभाषा व्यापक है.कौलान्तक पीठ को ही प्रयायवाची नामो से नीलखंड.उत्तराखंड.ज्ञानगंज.सिद्धाश्रम.महाहिमालय कहा जाता है.विश्व के सभी धर्मो में स्थित परम्पराओं से बहुत अलग है कौलान्तक पीठ की परम्पराएँ.इसकी मान्यताएं अभी तक संसार के सामने नहीं आयी है.केवल सिद्ध और कुछेक गुप्त नाथ और योगी ही इसकी जानकारी रखते हैं.अधिकाँश ज्ञान मौखिक ही दिया जाता है.मनाली में सोलंग नाला के पर्वत प्रमुख.मणिकरण के प्रमुख पर्वत.बंजार के हंसकुंड के पर्वत सैंज के खंडा धार पर्वत .धाराखरी.का जोगिनी गंधा पर्वत.जसे स्थानों से ये पीठ प्रारम्भ मानी जाती है.ये केवल आंशिक विवरण है.कुल्लू के जिया को भी पीठ भूमि कहा जाता है.महारिशी लोमेश को प्रथम पीठाधीश्वर माना जाता है.जिनको यह पद स्वयं भगवान शिव ने कैलाश मनसरूवर के तट पर दिया था.इन सबसे अलग पुरानो के अनुसार जब माता सति का दक्ष यज्ञ में जला शरीर ले कर शिव हिमालय में विचरण कर रहे थे तो भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता का शरीर काट दिया जिसके 108 टुकडे बने.जो शक्ति पीठ कहलाये .कही कही इनकी संख्या 64 भी कही गयी है.इनमेसे एक शक्ति पीठ ही कौलान्तक पीठ है.जहा माता की जंघा गिरी थी.लेकिन स्वयं कौलान्तक पीठ में प्रचलित कथा के अनुसार चतुर्थ मन्वंतर में पृथ्वी पर पाप बढ़ गया था .जिससे पृथ्वी नष्ट होने लगी .तब ऋषियों ने शिव से स्वयं पृथ्वी पर आने का निवेदन किया .माता शक्ति और शिव ने लोक कल्याण के लिए महा समुद्र से दिव्य हिमालय को प्रकट किया .और उसपर स्थित हो गए .यही महाहिमालय कौलान्तक पीठ कहा जाता है.शिव और शक्ति की प्रमुख पूजा की जाती है.कौलान्तक पीठ में 33 करोड़ देवी देवता रहते है.जिनमे से 18 करोड़ भारत में रहते है.बाकि यही से पृथ्वी पर फैल गए .भारत के लगभग सभी महारिषि कौलान्तक पीठ तक जरूर पहुचे है.उन्होंने अलग अलग नामो से इसका वर्णन भी किया है.कौलान्तक पीठ का एक द्वार उत्तरांचल में है.एक जम्मू कश्मीर में.एक पाकिस्तान में .एक नेपाल में.तीन तिब्बत में.एक भूटान और वर्मा में.ये नव द्वार है.कौलान्तक पीठ में योगी,यति सन्यासी,अघोरी,तांत्रिक,ऋषि,मुनि,मनीषी,अप्सराएँ,भेरव,भेरवियाँ,भूत,प्रेत,पिशाच,किन्नर,किरात,यक्ष,गन्धर्व,ब्रम्ह राक्षस आदि नाना प्रकार की योनियाँ स्थित है.व साधना करते है.अति संक्षेप में यही कौलान्तक पीठ है.

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